आस्था व श्रद्धा का पर्व बड़े उत्साह से मनाया…. गायों को अपने ऊपर से निकालकर निभाई परम्परा….

 

पेटलावद।श्रद्धा और आस्था का पर्व गाय गौहरी बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया गया
गायों के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए युवा ग्वालों ने जमीन पर लेटकर गाय की पांव की रज से अपने आपको पवित्र किया

आज दीपावली का तीसरे दिन है यानि पड़वा पर गाय गौहरी का पर्व मनाया गया । सूर्य ग्रहण के कारण दीपावली के तीसरे दिन पर्व मनाया गया
नगरके पंपावती नदी तट पर और रूपगढ़ व करड़ावद सहित समूचे अंचल में यह पर्व उत्साह के साथ मनाया गया। देशभर में प्रसिद्ध गाय गोहरी परंपरा का निर्वहन आज हुआ। पुरातन मान्यता के मुताबिक, लोगों के ऊपर से गायों का झुंड गुजरा। कहा जाता है कि यह पर्व गाय के प्रति ग्वालों की आस्था को प्रकट करता है। यही कारण है कि ग्वाला गायों को अपने ऊपर से गुजारते हैं। प्रतिवर्ष गो पालक दीवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा के लिये पूरे वर्षभर इंतजार करता है, खासतौर पर इस अवसर के लिये तैयारी करता है क्योंकि इसी दिन गोपालकों के लिये गायों के पैरों में गिरकर अपने शरीर पर से गायों क गुजरने देने की अनुठी परंपरा का निर्वाहन होता है।

पेटलावद में भी गाय गोहरी का पर्व- परंपरानुसार इस वर्ष भी मनाया गया। पंपावती नदी के किनारे गाय गोहरी पर्व देखने के लिए सैकड़ो लोग जुटे।सर्वप्रथम साडू माता के पूजन व आशीर्वाद लेकर करीब आधा दर्जन श्रद्धालु श्रद्धा और साहस के साथ मठ मंदिर प्रांगण में हाथों में छोटे-छोटे मुर्गी के चूजे लिए खडे थे। गायों को आता देख हाथों से चूजों को उड़ाया और औंधे जमीन पर लेट गए। देखते ही देखते दर्जनों गाय इन पर से गुजर गई। मुख्य रूप से आदिवासी, गुर्जर , गवली व सिर्वी समाज के लोगों ने पर्व में सहभागिता की।
समाजजनो का ऐसा मानना है कि मन्नतधारियो के ऊपर से गाय गुजरने पर उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होती है और उन्हें सुख-शांति और धन की प्राप्ति होती है। खेर झाबुआ आदिवासी अंचल है यहां कई ऐसी अनोखी और खतरनाक परंपरा है जिसका निर्वहन यहां के लोग आज भी बखूबी पूरा कर रहे है।

 

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